Class | Subject | Book | Chapter | Session | Questions covered |
|---|---|---|---|---|---|
XII | Hindi | Antra (NCERT) | 13 – गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात | 2026-27 | 15 of 15 |
बिंदु | विवरण |
|---|---|
लेखक | भीष्म साहनी (1915–2003), रावलपिंडी; ‘तमस’, ‘झरोखे’, ‘बसंती’ (उपन्यास), ‘हानूश’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’ (नाटक), आत्मकथा ‘आज के अतीत’ |
विधा | संस्मरण (‘आज के अतीत’ का अंश) |
सेवाग्राम (लगभग 1938) | भाई बलराज साहनी (‘नयी तालीम’ के सह-संपादक) के पास; गांधी जी के साथ प्रातः भ्रमण, रावलपिंडी की याद, रोगी बालक, तपेदिक का रोगी, जापानी भिक्षु, देशभक्त |
काश्मीर | झेलम पर नावों में नेहरू की शोभायात्रा; अनातोले फ्रांस की बाज़ीगर वाली कहानी; अखबार वाली घटना |
ट्यूनिस | अफ्रो-एशियाई लेखक संघ सम्मेलन; फ़िलिस्तीनी अस्थायी सरकार के सदरमुकाम में यास्सेर अराफ़ात का आतिथ्य |
मूल भाव | महापुरुषों की सहजता, करुणा, विनम्रता; राष्ट्रप्रेम और अंतरराष्ट्रीय मैत्री |
लेखक सेवाग्राम कब और क्यों गया था?
Answer
उत्तर
कब: लेखक सन् 1938 के आसपास सेवाग्राम गया था— उसी वर्ष, जब कांग्रेस का हरिपुरा अधिवेशन हुआ था।
क्यों: उन दिनों लेखक के भाई बलराज साहनी सेवाग्राम में रहते थे और वहाँ ‘नयी तालीम’ पत्रिका के सह-संपादक के रूप में काम कर रहे थे। लेखक कुछ दिन भाई के साथ बिताने के लिए उनके पास गया था। वहाँ वह लगभग तीन सप्ताह रहा और उसे गांधी जी का सान्निध्य भी मिला।
सन् 1938 के आसपास (कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन वाले वर्ष) — अपने भाई बलराज साहनी के साथ कुछ दिन बिताने, जो सेवाग्राम में ‘नयी तालीम’ पत्रिका के सह-संपादक थे; वहाँ वह लगभग तीन सप्ताह रहा।
लेखक का गांधी जी के साथ चलने का पहला अनुभव किस प्रकार का रहा?
Answer
उत्तर
- लेखक तड़के उठकर कच्ची सड़क पर आँखें गाड़े गांधी जी की राह देखने लगा। ठीक सात बजे गांधी जी साथियों के साथ आश्रम से निकले; उन्हें देखते ही लेखक पुलक उठा— वे हू-ब-हू चित्रों जैसे लग रहे थे, कमर से लटकती घड़ी भी परिचित-सी लगी।
- बलराज सो रहे थे; लेखक ने उन्हें झिंझोड़कर जगाया। तब तक गांधी जी की पार्टी काफ़ी दूर निकल गई थी; दोनों तेज़ कदमों से जाकर उनसे मिले।
- भाई ने परिचय कराया तो गांधी जी ने हँसकर कहा— “अच्छा। इसे भी घेर लिया।”
- साथ में डॉ. सुशीला नैयर और महादेव देसाई थे। लेखक संकोच में कभी इधर-उधर, कभी गांधी जी की धूलभरी चप्पलों की ओर देखता रहा; समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात करे।
- फिर उसने कहा— “आप बहुत साल पहले हमारे शहर रावलपिंडी आए थे।” गांधी जी रुक गए, आँखों में चमक आई और बोले— “याद है। मैं कोहाट से रावलपिंडी गया था… मिस्टर जॉन कैसे हैं?” और कहा— “अरे, मैं उन दिनों कितना काम कर लेता था। कभी थकता ही नहीं था।”
- महादेव देसाई आगे आकर उस दौरे की यादें सुनाने लगे और आश्रम के फाटक तक सुनाते रहे; गांधी जी बीच-बीच में धीमी आवाज़ में हँसते हुए कुछ कहते।
यह अनुभव लेखक के लिए रोमांचक, संकोचभरा और अविस्मरणीय रहा।
रोमांचक और संकोचभरा — चित्रों जैसे गांधी जी को देखकर लेखक पुलक उठा; देर होने पर भाई के साथ दौड़कर पार्टी से मिला; गांधी जी ने हँसकर कहा “इसे भी घेर लिया”; संकोच के बाद लेखक ने रावलपिंडी का ज़िक्र किया तो गांधी जी की आँखों में चमक आई, उन्होंने मिस्टर जॉन का हाल पूछा और पुराने दिनों के काम को याद किया; महादेव देसाई आश्रम तक उस दौरे की यादें सुनाते रहे।
लेखक ने सेवाग्राम में किन-किन लोगों के आने का ज़िक्र किया है?
Answer
उत्तर
- पृथ्वीसिंह आज़ाद— जिन्होंने हथकड़ियों समेत भागती रेलगाड़ी से छलाँग लगाई, निकल भागे और बरसों गुमनाम रहकर अध्यापन करते रहे।
- मीरा बेन
- खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान
- राजेंद्र बाबू (डॉ. राजेंद्र प्रसाद)— कुछ दिनों के लिए।
- इसके अतिरिक्त गांधी जी के साथ डॉ. सुशीला नैयर, निजी सचिव महादेव देसाई, कस्तूरबा, और आश्रम की प्रदक्षिणा करने वाले एक जापानी भिक्षु का भी उल्लेख है।
इन लोगों के रहते लगता ही नहीं था कि सेवाग्राम कोई दूर-पार का कस्बा है।
पृथ्वीसिंह आज़ाद (हथकड़ियों समेत भागती रेल से कूदने वाले), मीरा बेन, खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान और राजेंद्र बाबू; साथ ही डॉ. सुशीला नैयर, महादेव देसाई, कस्तूरबा और गाँग बजाकर प्रदक्षिणा करने वाला जापानी भिक्षु।
रोगी बालक के प्रति गांधी जी का व्यवहार किस प्रकार का था?
Answer
उत्तर
एक पंद्रह वर्ष का गाँव का लड़का खोखे में हाथ-पैर पटकता हुआ चिल्ला रहा था— “मैं मर रहा हूँ, बापू को बुलाओ।” आश्रमवासी ने कहा कि बापू ज़रूरी मीटिंग में हैं, पर कुछ ही देर में गांधी जी दोपहर में नंगे बदन पर खादी की हलकी चादर ओढ़े मैदान लाँघकर आ गए। 1. उन्होंने लड़के के फूले पेट पर स्नेह से हाथ फेरा और समझ गए— “ईख पीता रहा है? इतनी ज़्यादा पी गया? तू तो पागल है!” 2. उसे सहारा देकर उठाया और नाली के किनारे ले जाकर उँगली डालकर उलटी करने को कहा; वे उसकी पीठ पर हाथ रखे झुके रहे। 3. पेट हलका होने पर उसे खोखे में चुपचाप लेटने को कहा, कुछ देर पास खड़े रहे, आश्रमवासी को हिदायत दी। 4. पूरे समय उनके चेहरे पर लेशमात्र भी क्षोभ नहीं था; वे हँसते हुए “तू तो पागल है” कहकर चले गए।
इससे गांधी जी की करुणा, आत्मीयता, धैर्य, सहजता, विनोदप्रियता और सेवाभाव स्पष्ट होता है— वे ज़रूरी काम छोड़कर भी एक साधारण गाँव के लड़के की पुकार पर आ गए।
अत्यंत करुण, आत्मीय और धैर्यपूर्ण — ज़रूरी मीटिंग छोड़कर आए, फूले पेट पर हाथ फेरकर समझ गए कि ईख का रस ज़्यादा पी लिया है, सहारा देकर उठाया, उलटी कराते समय पीठ पर हाथ रखे झुके रहे, फिर लेटने को कहकर हिदायत दी; चेहरे पर ज़रा भी क्षोभ नहीं था, हँसते हुए “तू तो पागल है” कहकर चले गए।
काश्मीर के लोगों ने नेहरू जी का स्वागत किस प्रकार किया?
Answer
उत्तर
पंडित नेहरू की काश्मीर यात्रा पर उनका भव्य स्वागत हुआ। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में झेलम नदी पर, शहर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक— सातवें पुल से अमीराकदल तक— नावों में उनकी शोभायात्रा निकाली गई। नदी के दोनों ओर हज़ारों-हज़ार काश्मीर निवासी अदम्य उत्साह के साथ उनका स्वागत कर रहे थे। लेखक के अनुसार यह “अद्भुत दृश्य” था।
शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में झेलम नदी पर सातवें पुल से अमीराकदल तक नावों में नेहरू जी की भव्य शोभायात्रा निकाली गई, और नदी के दोनों किनारों पर हज़ारों-हज़ार काश्मीरियों ने अदम्य उत्साह से उनका स्वागत किया — एक अद्भुत दृश्य।
अखबार वाली घटना से नेहरू जी के व्यक्तित्व की कौन सी विशेषता स्पष्ट होती है?
Answer
उत्तर
घटना: सुबह लेखक बरामदे में अखबार देख रहा था। नेहरू जी के उतरने की आहट पाकर उसे एक बचकानी हरकत सूझी— वह अखबार तभी देगा जब नेहरू जी माँगेंगे, ताकि इस बहाने छोटी-सी बात हो जाए। नेहरू जी आकर चुपचाप एक ओर खड़े रहे; लेखक की टाँगें लरज़ने लगीं, फिर भी वह अखबार थामे रहा। कुछ देर बाद नेहरू जी ने धीरे से कहा— “आपने देख लिया हो तो क्या मैं एक नज़र देख सकता हूँ?” यह सुनकर लेखक पानी-पानी हो गया।
विशेषताएँ: 1. विनम्रता और शिष्टता— इतने बड़े नेता होकर भी एक युवक से ‘आप’ कहकर, अनुमति माँगकर अखबार माँगा। 2. धैर्य और संयम— न बिगड़े, न झिड़का, चुपचाप प्रतीक्षा की। 3. दूसरों का सम्मान— पद या आयु के अहंकार के बिना सबको आदर देना। 4. सहजता और सौम्यता— उनके व्यवहार में कोई बनावट या रौब नहीं था।
लेखक के जानबूझकर अखबार न देने पर भी नेहरू जी चुपचाप प्रतीक्षा करते रहे और धीरे से बोले — “आपने देख लिया हो तो क्या मैं एक नज़र देख सकता हूँ?” — इससे उनकी विनम्रता, शिष्टता, धैर्य-संयम, छोटे-बड़े सबके प्रति सम्मान और अहंकारहीन सहजता स्पष्ट होती है।
उत्तर
फ़िलिस्तीन के प्रति भारत का रवैया बहुत सहानुभूतिपूर्ण एवं समर्थन भरा क्यों था?
Answer
उत्तर
- साम्राज्यवाद-विरोध की साझी भावना: भारत स्वयं लगभग दो सौ वर्ष तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार रहा था और लंबे संघर्ष के बाद स्वतंत्र हुआ। इसलिए वह किसी भी देश पर साम्राज्यवादी शक्तियों के अन्याय की पीड़ा समझता था।
- फ़िलिस्तीन के प्रति साम्राज्यवादी शक्तियों का अन्यायपूर्ण रवैया: फ़िलिस्तीनियों को उनकी भूमि और अधिकारों से वंचित किया गया; पाठ के अनुसार भारत के नेताओं ने इस अन्यायपूर्ण रवैये की भर्त्सना की थी।
- गांधी-नेहरू की नीति: गांधी जी ने न्याय और अहिंसा के आधार पर फ़िलिस्तीनी अधिकारों का समर्थन किया; नेहरू जी की गुटनिरपेक्ष और उपनिवेशवाद-विरोधी विदेश नीति ने दबे-कुचले राष्ट्रों के स्वतंत्रता-संघर्ष का साथ दिया।
- जन-भावना: पाठ के अनुसार फ़िलिस्तीन आंदोलन के प्रति भारत के देशवासियों में विशाल स्तर पर सहानुभूति और समर्थन था।
- अफ्रो-एशियाई एकता: भारत अफ़्रीका और एशिया के देशों की मैत्री और एकता का समर्थक था।
भारत स्वयं साम्राज्यवाद का शिकार रहकर संघर्ष से स्वतंत्र हुआ था, इसलिए फ़िलिस्तीनियों के प्रति साम्राज्यवादी शक्तियों के अन्याय की पीड़ा समझता था; भारतीय नेताओं ने उस अन्याय की भर्त्सना की; गांधी-नेहरू की न्यायप्रिय, उपनिवेशवाद-विरोधी और गुटनिरपेक्ष नीति दबे राष्ट्रों के साथ थी; देशवासियों में फ़िलिस्तीन आंदोलन के प्रति व्यापक सहानुभूति थी; और भारत अफ्रो-एशियाई एकता का पक्षधर था।
अराफ़ात के आतिथ्य प्रेम से संबंधित किन्हीं दो घटनाओं का वर्णन कीजिए।
Answer
उत्तर
- फल छीलकर खिलाना और शहद की चाय बनाना: ट्यूनिस में फ़िलिस्तीनी अस्थायी सरकार के सदरमुकाम में भोजन के निमंत्रण पर अराफ़ात स्वयं बाहर आकर लेखक और उनकी पत्नी को अंदर लिवा ले गए। बातचीत के बीच वे अपने हाथों से फल छील-छीलकर खिला रहे थे और उनके लिए शहद की चाय बना रहे थे; साथ-साथ इंजीनियरिंग की शिक्षा, हवाई यात्राओं और शहद की उपयोगिता पर बातें करते रहे।
- तौलिया लिए खड़े रहना: भोजन से पहले लेखक गुसलखाने गया। जब वह बाहर निकला तो देखा कि स्वयं यास्सेर अराफ़ात तौलिया हाथ में लिए बाहर खड़े थे। लेखक की झेंप का अंत न रहा।
(इसके अतिरिक्त, लेखक के स्वागत में मेज़ पर पूरा भुना हुआ बकरा सजा था और बीसेक अधिकारी व लेखक तपाक से मिले।)
- अराफ़ात स्वयं बाहर आकर लेखक और उनकी पत्नी को अंदर ले गए और बातचीत के बीच अपने हाथों से फल छील-छीलकर खिलाते रहे और शहद की चाय बनाते रहे। (2) भोजन से पहले लेखक गुसलखाने से निकला तो अराफ़ात स्वयं तौलिया लिए बाहर खड़े थे — लेखक की झेंप का अंत न रहा।
अराफ़ात ने ऐसा क्यों बोला कि ‘वे आपके ही नहीं हमारे भी नेता हैं। उतने ही आदरणीय जितने आपके लिए।’ इस कथन के आधार पर गांधी जी के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
Answer
उत्तर
क्यों बोला: बातचीत में जब लेखक ने गांधी जी और भारत के अन्य नेताओं का ज़िक्र किया, तो अराफ़ात ने यह कहा, क्योंकि गांधी जी केवल भारत के नहीं, विश्व के सभी शोषित और पराधीन लोगों के प्रेरणा-स्रोत थे। उन्होंने अन्याय और साम्राज्यवाद के विरुद्ध जो संघर्ष किया, उसने फ़िलिस्तीन जैसे संघर्षरत देशों को भी मार्ग दिखाया। भारत के नेताओं ने फ़िलिस्तीन के प्रति अन्याय की भर्त्सना की थी, इसलिए फ़िलिस्तीनी उन्हें अपना नेता मानते थे।
गांधी जी का व्यक्तित्व: 1. विश्व-नेता: उनके सत्य-अहिंसा के सिद्धांतों ने मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला जैसे नेताओं को प्रेरित किया; वे सार्वभौमिक मानवता के प्रतीक थे। 2. अन्याय-विरोधी: दक्षिण अफ़्रीका से भारत तक उन्होंने रंगभेद, साम्राज्यवाद और हर प्रकार के शोषण का विरोध किया। 3. करुणा और सेवाभाव: (पाठ में) रोगी बालक की सेवा, तपेदिक के रोगी का रोज़ हाल पूछना। 4. सहजता और विनोदप्रियता: “इसे भी घेर लिया”, “तू तो पागल है”। 5. अद्भुत स्मरण-शक्ति और आत्मीयता: बरसों बाद भी रावलपिंडी और मिस्टर जॉन को याद रखना। 6. सादगी: नंगे बदन पर खादी की चादर, धूलभरी चप्पलें। 7. सर्वधर्म-समभाव: मुस्लिम बैरिस्टर के यहाँ ठहरना, जापानी भिक्षु का आदर।
गांधी जी का अन्याय और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष विश्व के सभी शोषित-पराधीन लोगों का प्रेरणा-स्रोत था और भारतीय नेताओं ने फ़िलिस्तीन पर अन्याय की भर्त्सना की थी, इसलिए अराफ़ात उन्हें अपना नेता मानते थे। गांधी जी का व्यक्तित्व: सत्य-अहिंसा से प्रेरित विश्व-नेता, हर अन्याय के विरोधी, करुणा और सेवाभाव से भरे (रोगी बालक, तपेदिक रोगी), सहज-विनोदी, आत्मीय (रावलपिंडी और मिस्टर जॉन की याद), सादगीपूर्ण और सर्वधर्म-समभावी।
अभ्यास – भाषा-शिल्प
पाठ से क्रिया विशेषण छाँटिए और उनका अपने वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
Answer
उत्तर
क्रिया विशेषण (पाठ से) | भेद | अपना वाक्य |
|---|---|---|
देर रात (मैं देर रात सेवाग्राम पहुँचा) | कालवाचक | पिताजी कल देर रात घर लौटे। |
तड़के (मैं तड़के ही उठ बैठा) | कालवाचक | किसान तड़के ही खेत पर चले जाते हैं। |
ऐन सात बजे | कालवाचक | रेलगाड़ी ऐन समय पर आई। |
प्रातः / अकसर | कालवाचक | मैं अकसर प्रातः टहलने जाता हूँ। |
शीघ्र ही | कालवाचक | परीक्षा शीघ्र ही शुरू होगी। |
आगे / पीछे / इधर / आसपास | स्थानवाचक | बच्चे आसपास खेल रहे थे। |
धीरे-धीरे / धीरे से | रीतिवाचक | माँ ने धीरे से दरवाज़ा खोला। |
चुपचाप | रीतिवाचक | वह चुपचाप कक्षा में बैठ गया। |
हँसकर / मुसकुराकर | रीतिवाचक | दादी ने मुसकुराकर आशीर्वाद दिया। |
सहसा | रीतिवाचक | सहसा बिजली चली गई। |
बार-बार | रीतिवाचक | वह बार-बार घड़ी देख रहा था। |
बड़ी तन्मयता से / बड़े इत्मीनान से | रीतिवाचक | वह बड़ी तन्मयता से चित्र बना रहा था। |
बहुत धीमी आवाज़ में | रीतिवाचक | गुरुजी बहुत धीमी आवाज़ में बोले। |
थोड़ा / कुछ देर / काफ़ी दूर | परिमाणवाचक | हम काफ़ी दूर पैदल चले। |
पाठ के क्रिया विशेषण — कालवाचक: देर रात, तड़के, ऐन सात बजे, प्रातः, अकसर, शीघ्र ही; स्थानवाचक: आगे, पीछे, इधर, आसपास; रीतिवाचक: धीरे-धीरे, चुपचाप, हँसकर, मुसकुराकर, सहसा, बार-बार, बड़ी तन्मयता से; परिमाणवाचक: थोड़ा, कुछ देर, काफ़ी दूर। वाक्य: “किसान तड़के ही खेत पर चले जाते हैं।” “वह चुपचाप कक्षा में बैठ गया।” “सहसा बिजली चली गई।” “हम काफ़ी दूर पैदल चले।”
‘मैं सेवाग्राम में …………… माँ जैसी लगतीं’ गद्यांश में क्रिया पर ध्यान दीजिए।
Answer
उत्तर
गद्यांश: “मैं सेवाग्राम में लगभग तीन सप्ताह तक रहा। अकसर ही प्रातः उस टोली के साथ हो लेता। शाम को प्रार्थना सभा में जा पहुँचता, जहाँ सभी आश्रमवासी तथा कस्तूरबा एक ओर को पालथी मारे और दोनों हाथ गोद में रखे बैठी होतीं और बिलकुल मेरी माँ जैसी लगतीं।”
क्रियाओं पर टिप्पणी: 1. रहा— सामान्य भूतकाल; एक निश्चित अवधि (तीन सप्ताह) की पूरी हो चुकी क्रिया। 2. हो लेता, जा पहुँचता— संयुक्त क्रियाएँ (हो + लेना, जा + पहुँचना); ‘ता’ प्रत्यय के साथ नित्य/अभ्यासवाची भूतकाल (हेतुहेतुमद्/ आदतन भूत)— जो काम उन दिनों रोज़ आदतन होता था। ‘ही’ के साथ ‘अकसर’ इसकी आवृत्ति पर बल देता है। 3. मारे, रखे— पूर्वकालिक/स्थितिबोधक कृदंत रूप— बैठने की मुद्रा (पालथी मारकर, हाथ गोद में रखकर) बताते हैं। 4. बैठी होतीं, लगतीं— स्त्रीलिंग, बहुवचन (आदरार्थक) रूप; कस्तूरबा के प्रति आदर दिखाने के लिए बहुवचन क्रिया; ये भी आदतन होने वाली स्थिति बताते हैं।
इन क्रियाओं से पता चलता है कि यह एक दिन का नहीं, सेवाग्राम-प्रवास के दौरान रोज़ का नियम था, और ‘माँ जैसी लगतीं’ से कस्तूरबा के प्रति लेखक की आत्मीयता प्रकट होती है।
‘रहा’ सामान्य भूत (तीन सप्ताह की पूरी क्रिया) है; ‘हो लेता’, ‘जा पहुँचता’ संयुक्त क्रियाएँ हैं जो ‘ता’ प्रत्यय से आदतन/नित्य भूतकाल बताती हैं (रोज़ का नियम, ‘अकसर’ से बल); ‘पालथी मारे’, ‘हाथ रखे’ स्थितिबोधक कृदंत हैं; ‘बैठी होतीं’, ‘लगतीं’ कस्तूरबा के प्रति आदर में स्त्रीलिंग बहुवचन, आदतन क्रियाएँ हैं — इनसे दिनचर्या की नियमितता और कस्तूरबा के प्रति आत्मीयता प्रकट होती है।
नेहरू जी द्वारा सुनाई गई कहानी को अपने शब्दों में लिखिए।
Answer
उत्तर
काश्मीर में खाने की मेज़ पर धर्म को लेकर रामेश्वरी नेहरू से बहस होने पर नेहरू जी ने फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक अनातोले फ्रांस की यह कहानी सुनाई—
पेरिस में एक गरीब, बूढ़ा होता बाज़ीगर (नट) था, जो करतब दिखाकर पेट पालता था। क्रिसमस के दिन पेरिस के लोग सजे-धजे, फूल और उपहार लिए बड़े गिरजे में माता मरियम को श्रद्धांजलि देने जा रहे थे। बाज़ीगर हताश होकर बाहर खड़ा था— न उसके पास कोई उपहार था, न कोई उस फटेहाल को अंदर जाने देता।
तभी उसके मन में विचार आया— मैं उपहार तो नहीं दे सकता, पर अपने करतब दिखाकर माता मरियम की अभ्यर्थना कर सकता हूँ। जब श्रद्धालु चले गए और गिरजा खाली हो गया, वह चुपके से अंदर गया और कपड़े उतारकर पूरी तन्मयता से एक के बाद एक करतब दिखाने लगा— कभी सिर के बल खड़ा होता, कभी तरह-तरह से अंग घुमाता— यहाँ तक कि हाँफने लगा।
हाँफने की आवाज़ सुनकर बड़े पादरी ने समझा कि कोई जानवर गिरजे को दूषित कर रहा है। अंदर आकर नट को सिर के बल खड़ा देखकर वह तिलमिला उठा— माता मरियम का इससे बड़ा अपमान क्या होगा! आगबबूला होकर वह नट को लात मारकर निकालने बढ़ा, तभी उसने देखा कि माता मरियम की मूर्ति अपने मंच से उतरकर धीरे-धीरे नट के पास पहुँची और अपने आँचल से उसके माथे का पसीना पोंछकर उसका सिर सहलाने लगी।
संदेश: सच्चा धर्म कर्मकांड, धन या दिखावे में नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा और निष्कपट भाव में है। ईश्वर गरीब के सच्चे समर्पण को स्वीकार करता है।
अनातोले फ्रांस की कहानी — पेरिस का एक गरीब बूढ़ा बाज़ीगर क्रिसमस पर माता मरियम को चढ़ाने के लिए कुछ न होने से उदास था; गिरजा खाली होने पर वह चुपके से अंदर जाकर पूरी तन्मयता से करतब दिखाने लगा और हाँफने लगा; बड़ा पादरी इसे अपमान समझकर उसे लात मारकर निकालने बढ़ा, तभी माता मरियम की मूर्ति मंच से उतरकर आई और आँचल से नट का पसीना पोंछकर उसका सिर सहलाने लगी। संदेश: सच्चा धर्म दिखावे में नहीं, निष्कपट श्रद्धा में है।
अभ्यास – योग्यता-विस्तार
भीष्म साहनी की अन्य रचनाएँ ‘तमस’ तथा ‘मेरा भाई बलराज’ पढ़िए।
Answer
उत्तर
(पठन हेतु संक्षिप्त परिचय)
- ‘तमस’ (1973, साहित्य अकादमी पुरस्कार 1975): भारत-विभाजन से ठीक पहले 1947 में पंजाब (रावलपिंडी के आसपास) में भड़के सांप्रदायिक दंगों पर आधारित उपन्यास। कहानी नत्थू नामक चमार से शुरू होती है, जिससे धोखे से एक सूअर मरवाकर मस्जिद के सामने फेंकवा दिया जाता है, जिससे दंगे भड़क उठते हैं। उपन्यास दिखाता है कि राजनीतिक स्वार्थ, अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो’ नीति और धार्मिक कट्टरता किस प्रकार साधारण लोगों को हिंसा की आग में झोंक देते हैं। ‘तमस’ का अर्थ है अंधकार— मानवता पर छाया सांप्रदायिकता का अंधकार। इस पर गोविंद निहलानी ने धारावाहिक/फ़िल्म भी बनाई।
- ‘मेरा भाई बलराज’: अपने बड़े भाई, प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता बलराज साहनी पर लिखा गया संस्मरणात्मक जीवनी-ग्रंथ। इसमें बलराज के बचपन, शिक्षा, शांतिनिकेतन और सेवाग्राम (नयी तालीम) में काम, बीबीसी लंदन, इप्टा (IPTA) से जुड़ाव, ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘काबुलीवाला’, ‘गरम हवा’ जैसी फ़िल्मों में अभिनय, उनके मानवीय और प्रगतिशील विचारों का आत्मीय चित्रण है।
पढ़ने से लाभ: इन रचनाओं से भीष्म साहनी की यथार्थवादी, मानवीय दृष्टि और सरल शैली को समझने में मदद मिलती है; पाठ में आए बलराज और रावलपिंडी के प्रसंगों की पृष्ठभूमि भी स्पष्ट होती है।
‘तमस’ (साहित्य अकादमी पुरस्कार) — 1947 के विभाजन से पहले पंजाब के सांप्रदायिक दंगों पर उपन्यास, जो दिखाता है कि राजनीतिक स्वार्थ, अंग्रेज़ों की फूट-नीति और कट्टरता साधारण लोगों को हिंसा में झोंक देते हैं। ‘मेरा भाई बलराज’ — अभिनेता बलराज साहनी के जीवन (शांतिनिकेतन, सेवाग्राम, बीबीसी, इप्टा, ‘दो बीघा ज़मीन’, ‘गरम हवा’) का आत्मीय संस्मरणात्मक चित्रण। इनसे लेखक की यथार्थवादी, मानवीय दृष्टि और पाठ की पृष्ठभूमि समझ में आती है।
गांधी तथा नेहरू जी से संबंधित अन्य संस्मरण भी पढ़िए और उन पर टिप्पणी लिखिए।
Answer
उत्तर
गांधी जी से संबंधित संस्मरण: 1. पेंसिल का टुकड़ा: काका कालेलकर के अनुसार, एक बार गांधी जी की छोटी-सी पेंसिल खो गई तो वे उसे ढूँढ़ते रहे, क्योंकि वह एक बच्चे ने उन्हें प्रेम से दी थी और वे किसी वस्तु की बर्बादी नहीं चाहते थे। टिप्पणी: यह उनकी मितव्ययिता और भावनाओं के आदर को दिखाता है। 2. आधी धोती: 1921 में मदुरै में गरीब किसानों को अधनंगा देखकर गांधी जी ने आजीवन केवल एक धोती पहनने का निश्चय किया। टिप्पणी: यह गरीबों से तादात्म्य और सादगी का प्रमाण है।
नेहरू जी से संबंधित संस्मरण: 1. बच्चों के ‘चाचा नेहरू’: नेहरू जी अपनी अचकन में लाल गुलाब लगाते थे और बच्चों से बहुत स्नेह करते थे। एक बार भीड़ में रोते बच्चे को उन्होंने स्वयं गोद में उठाकर चुप कराया। टिप्पणी: यह उनकी आत्मीयता और कोमल हृदय को दिखाता है। 2. जेल में लेखन: जेल में रहते हुए उन्होंने बेटी इंदिरा को पत्र लिखे (‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’) और ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ लिखी। टिप्पणी: यह उनके अध्ययनशील, इतिहास-प्रेमी व्यक्तित्व और कठिन परिस्थितियों में भी रचनात्मक बने रहने की क्षमता का प्रमाण है।
समग्र टिप्पणी: ये संस्मरण, पाठ की तरह ही, दिखाते हैं कि महापुरुषों की महानता उनके छोटे-छोटे व्यवहारों में झलकती है। - गांधी जी के प्रसंगों में सादगी, करुणा और अनुशासन दिखता है। - नेहरू जी के प्रसंगों में विनम्रता, स्नेह और बौद्धिकता दिखती है।
उदाहरण: - गांधी जी की खोई पेंसिल: मितव्ययिता और भावनाओं का आदर। - मदुरै में आधी धोती का संकल्प: गरीबों से तादात्म्य और सादगी। - बच्चों के ‘चाचा नेहरू’: भीड़ में रोते बच्चे को गोद में लेकर चुप कराना, स्नेह और आत्मीयता। - नेहरू जी का जेल-लेखन: ‘पिता के पत्र पुत्री के नाम’ और ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ से उनकी बौद्धिकता।
टिप्पणी: महापुरुषों की महानता उनके छोटे-छोटे व्यवहारों में झलकती है। गांधी जी में सादगी, करुणा और अनुशासन है; नेहरू जी में विनम्रता, स्नेह और बौद्धिकता।
यास्सेर अराफ़ात के आतिथ्य से क्या प्रेरणा मिलती है और अपने अतिथि का सत्कार आप किस प्रकार करना चाहेंगे।
Answer
उत्तर
प्रेरणा: 1. विनम्रता: एक राष्ट्र के सर्वोच्च नेता होकर भी अराफ़ात ने स्वयं अतिथियों का स्वागत किया, फल छीलकर खिलाए, चाय बनाई और तौलिया लेकर खड़े रहे। पद का अहंकार सच्चे आतिथ्य में बाधक नहीं होना चाहिए। 2. व्यक्तिगत ध्यान: अतिथि की छोटी-छोटी ज़रूरतों का स्वयं ध्यान रखना ही सच्चा सत्कार है। 3. आत्मीयता: हमें अतिथि को इतना सहज कर देना चाहिए कि वह “बड़े इत्मीनान से” बात कर सके। 4. “अतिथि देवो भव”: यह भारतीय परंपरा अराफ़ात के व्यवहार में साकार दिखी। अतिथि-सत्कार सभी संस्कृतियों में समान रूप से महत्वपूर्ण है।
मैं अपने अतिथि का सत्कार कैसे करूँगा: 1. अतिथि का मुस्कराकर, आदर से स्वागत करूँगा और उसका सामान स्वयं उठाऊँगा। 2. पानी, चाय-नाश्ता और भोजन अपने हाथ से परोसूँगा। उसकी पसंद-नापसंद और स्वास्थ्य का ध्यान रखूँगा। 3. उसके ठहरने के लिए साफ़-सुथरा, आरामदायक स्थान दूँगा और ज़रूरत की चीज़ें (तौलिया, साबुन आदि) पहले से रखूँगा। 4. उससे आत्मीयता से बातचीत करूँगा, ताकि वह सहज महसूस करे। उसे अपने शहर के दर्शनीय स्थल दिखाऊँगा। 5. विदा करते समय कोई छोटा-सा उपहार दूँगा और उसे स्टेशन तक छोड़ने जाऊँगा।
प्रेरणा: बड़े पद पर रहकर भी विनम्रता (स्वयं फल छीलना, चाय बनाना, तौलिया लेकर खड़े रहना), अतिथि की छोटी-छोटी ज़रूरतों पर व्यक्तिगत ध्यान, आत्मीयता और “अतिथि देवो भव” की भावना।
मेरा सत्कार: - मुस्कराकर आदर से स्वागत करूँगा और अपने हाथ से भोजन परोसूँगा। - उसकी पसंद और आराम का ध्यान रखूँगा, ज़रूरत की चीज़ें पहले से तैयार रखूँगा। - आत्मीयता से बात करूँगा और उसे शहर घुमाऊँगा। - विदा के समय छोटा उपहार देकर स्टेशन तक छोड़ने जाऊँगा।
विषय-सूची की जाँच
- ☒ सेवाग्राम और गांधी जी (प्रश्न 1–4)
- ☒ काश्मीर और नेहरू जी (प्रश्न 5–6)
- ☒ फ़िलिस्तीन और अराफ़ात (प्रश्न 7–9)
- ☒ भाषा-शिल्प (प्रश्न 10–12)
- ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 13–15)