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Class 12 Hindi Antra Chapter 15

NCERT Solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 15: जहाँ कोई वापसी नहीं

Class

Subject

Book

Chapter

Session

Questions covered

XII

Hindi

Antra (NCERT)

15 – जहाँ कोई वापसी नहीं

2026-27

16 of 16

बिंदु

विवरण

लेखक

निर्मल वर्मा (1929–2005), शिमला; ‘कव्वे और काला पानी’ (साहित्य अकादमी 1985), ‘वे दिन’, ‘चीड़ों पर चाँदनी’, ‘धुंध से उठती धुन’

विधा

यात्रा-वृत्तांत (‘धुंध से उठती धुन’ से), सिंगरौली— 1983

स्थान

सिंगरौली का नवागाँव क्षेत्र (लगभग 18 गाँव, 50,000 से अधिक आबादी), अमझर गाँव; अमरौली प्रोजेक्ट

विषय

औद्योगीकरण से विस्थापन; ‘नए शरणार्थी’; प्रकृति और इतिहास (विकास) से विस्थापन का अंतर; यूरोप बनाम भारत की पर्यावरण-चिंता

प्रमुख कथन

“आदमी उजड़ेगा, तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे?”; “कभी-कभी किसी इलाके की संपदा ही उसका अभिशाप बन जाती है।”

निष्कर्ष

स्वतंत्र भारत की ट्रैजेडी— पश्चिम की नकल में प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के नाज़ुक संतुलन की उपेक्षा

Q1

अमझर से आप क्या समझते हैं? अमझर गाँव में सूनापन क्यों है?

Answer

उत्तर

अमझर: सिंगरौली के नवागाँव क्षेत्र का एक गाँव— “आम के पेड़ों से घिरा गाँव, जहाँ आम झरते हैं” (आम + झरना)।

सूनापन क्यों: पिछले दो-तीन वर्षों से वहाँ पेड़ों पर सूनापन है— न कोई फल पकता है, न कुछ नीचे झरता है। जब से सरकारी घोषणा हुई कि अमरौली प्रोजेक्ट के अंतर्गत नवागाँव के अनेक गाँव उजाड़ दिए जाएँगे, तब से न जाने कैसे आम के पेड़ सूखने लगे। लेखक कहता है— “आदमी उजड़ेगा, तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे?” मानो पेड़ भी मनुष्य के विस्थापन के विरोध में मूक सत्याग्रह कर रहे हों। गाँववालों के मन में भी उजड़ने का भय और उदासी छाई है।

प्रश्न 1

अमझर — आम के पेड़ों से घिरा वह गाँव जहाँ आम झरते हैं। अमरौली प्रोजेक्ट के अंतर्गत गाँव उजाड़े जाने की सरकारी घोषणा के बाद से आम के पेड़ सूखने लगे, न फल पकते हैं न झरते हैं — मानो पेड़ भी मनुष्य के विस्थापन के विरोध में मूक सत्याग्रह कर रहे हों (“आदमी उजड़ेगा, तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे?”); इसी से गाँव में सूनापन है।

उत्तर

Q2

आधुनिक भारत के ‘नए शरणार्थी’ किन्हें कहा गया है?

Answer

उत्तर

लेखक ने उन ग्रामीणों, किसानों और आदिवासियों को आधुनिक भारत के ‘नए शरणार्थी’ कहा है, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात ने अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया है— जैसे सिंगरौली के अमझर और नवागाँव के लोग, जिनके गाँव कोयला खदानों, ताप-विद्युत गृहों, बाँधों (रिहंद) और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए उजाड़ दिए गए। ये लोग अपने गाँव से उजड़कर शहरों की गंदी, दम घुटती मज़दूर बस्तियों और स्लम्स में अनाथ, उन्मूलित ज़िंदगी जीने को विवश होते हैं— जैसे धान रोपने वाली औरतें भोपाल, जबलपुर या बैढ़न की सड़कों पर पत्थर कूटेंगी।

विभाजन के शरणार्थियों की तरह ये भी अपने ही देश में बेघर हो जाते हैं, पर इनका विस्थापन ‘विकास’ के नाम पर होता है।

वे ग्रामीण, किसान और आदिवासी, जिन्हें औद्योगीकरण के झंझावात (खदानें, ताप-विद्युत गृह, बाँध) ने ‘विकास’ के नाम पर अपनी घर-ज़मीन से उखाड़कर हमेशा के लिए निर्वासित कर दिया — जैसे सिंगरौली के लोग, जो शहरों की गंदी बस्तियों में मज़दूरी और पत्थर कूटने को विवश होते हैं।

Q3

प्रकृति के कारण विस्थापन और औद्योगीकरण के कारण विस्थापन में क्या अंतर है?

Answer

उत्तर

आधार

प्रकृति के कारण विस्थापन

औद्योगीकरण के कारण विस्थापन

कारण

बाढ़, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएँ

विकास और प्रगति के नाम पर कारखाने, खदानें, बाँध आदि

अवधि

अस्थायी— “कुछ अरसे के लिए”

स्थायी— “फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौट सकते”

वापसी

“आफत टलते ही वे दोबारा अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट भी आते हैं”

वापसी असंभव— गाँव, खेत, पेड़ औद्योगिक कॉलोनी की ईंटों के नीचे दब जाते हैं

परिवेश

परिवेश अस्थायी रूप से प्रभावित, बाद में पुनर्जीवित

मनुष्य के साथ उसका परिवेश, आवास-स्थल और संस्कृति हमेशा के लिए नष्ट

लेखक का शब्द

‘प्रकृति’

‘इतिहास’ (मनुष्य-निर्मित)

लेखक इसे “प्रकृति और इतिहास के बीच गहरा अंतर” कहता है।

प्राकृतिक आपदा (बाढ़, भूकंप) से विस्थापन अस्थायी होता है — आफत टलते ही लोग अपने जाने-पहचाने परिवेश में लौट आते हैं; पर औद्योगीकरण से विकास के नाम पर हुआ विस्थापन स्थायी होता है — लोग कभी वापस नहीं लौट पाते, क्योंकि मनुष्य के साथ उसका परिवेश, आवास-स्थल और संस्कृति भी हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

Q4

यूरोप और भारत की पर्यावरण संबंधी चिंताएँ किस प्रकार भिन्न हैं?

Answer

उत्तर

यूरोप में: पर्यावरण का प्रश्न मनुष्य और भूगोल के बीच संतुलन बनाए रखने का है— अर्थात प्रदूषण, जंगल, जल, जलवायु जैसे भौतिक संसाधनों की रक्षा। वहाँ की सांस्कृतिक विरासत म्यूज़ियम्स और संग्रहालयों में जमा है, इसलिए पर्यावरण-विनाश से संस्कृति सीधे नष्ट नहीं होती।

भारत में: यही प्रश्न मनुष्य और उसकी संस्कृति के बीच पारंपरिक संबंध बनाए रखने का हो जाता है। भारत की सांस्कृतिक विरासत उन रिश्तों से जीवित है, जो आदमी को उसकी धरती, जंगलों, नदियों— उसके समूचे परिवेश— से जोड़ते हैं। “अतीत का समूचा मिथक संसार पोथियों में नहीं, इन रिश्तों की अदृश्य लिपि में मौजूद रहता था।” इसलिए भारत में पर्यावरण-विनाश का अर्थ है संस्कृति, परंपरा और जीवन-पद्धति का विनाश।

यूरोप में पर्यावरण का प्रश्न मनुष्य और भूगोल के बीच संतुलन का है, क्योंकि वहाँ की संस्कृति संग्रहालयों में सुरक्षित है; भारत में यह मनुष्य और उसकी संस्कृति के पारंपरिक संबंध को बचाने का प्रश्न है, क्योंकि यहाँ की संस्कृति धरती, जंगल, नदियों से जुड़े रिश्तों की ‘अदृश्य लिपि’ में जीवित है — पर्यावरण-विनाश यहाँ संस्कृति का विनाश है।

Q5

लेखक के अनुसार स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी ‘ट्रैजेडी’ क्या है?

Answer

उत्तर

लेखक के अनुसार स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी ट्रैजेडी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगीकरण का मार्ग चुना, बल्कि यह है कि— 1. पश्चिम की देखादेखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय हमारे पश्चिम-शिक्षित सत्ताधारियों का ध्यान कभी इस ओर नहीं गया कि प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाज़ुक संतुलन किस तरह नष्ट होने से बचाया जा सकता है। 2. शासकों को कभी यह खयाल नहीं आया कि हम बिना पश्चिम को मॉडल बनाए, अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर, औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित कर सकते हैं। 3. पैंतीस वर्ष पहले हम ऐसा विकल्प चुन सकते थे, जिसमें मानव-सुख की कसौटी भौतिक लिप्सा नहीं, जीवन की ज़रूरतें होतीं; भारत में इसकी संभावना थी, क्योंकि अंग्रेज़ी राज उसे पूरी तरह ‘सांस्कृतिक कॉलोनी’ नहीं बना पाया था— पर हमने वह अवसर खो दिया।

ट्रैजेडी औद्योगीकरण चुनना नहीं, बल्कि यह कि पश्चिम की नकल में योजनाएँ बनाते समय पश्चिम-शिक्षित शासकों ने प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के नाज़ुक संतुलन को बचाने पर ध्यान नहीं दिया, और अपनी शर्तों-मर्यादाओं पर, भौतिक लिप्सा के बजाय जीवन की ज़रूरतों पर आधारित औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप तय करने का अवसर खो दिया।

Q6

औद्योगीकरण ने पर्यावरण का संकट पैदा कर दिया है, क्यों और कैसे?

Answer

उत्तर

क्यों: औद्योगीकरण का उद्देश्य अधिक उत्पादन और मुनाफ़ा रहा है; उसमें मानव-सुख की कसौटी भौतिक लिप्सा बन गई। “लोलुप युग” में संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हुआ और विकास तथा पर्यावरण-सुरक्षा के बीच संतुलन की उपेक्षा की गई।

कैसे (पाठ के आधार पर): 1. वनों का विनाश: सिंगरौली के कत्था, महुआ, बाँस, शीशम के घने जंगल ठेकेदारों और वन-अधिकारियों के “गिद्धों और चीलों” जैसे आक्रमण से नष्ट हुए। 2. खनन: कोयले की खदानों ने धरती को खोखला किया। 3. प्रदूषण: ताप-विद्युत गृहों की शृंखला से वायु, जल और भूमि प्रदूषित हुई। 4. उपजाऊ भूमि का नाश: धान के खेत, आम के पेड़ “गंदी, आधुनिक औद्योगिक कॉलोनी की ईंटों के नीचे” दब जाएँगे। 5. बाँध: रिहंद बाँध से हज़ारों गाँव डूबे। 6. विस्थापन और स्लम: उजड़े लोग शहरों की गंदी, दम घुटती बस्तियों में रहने को विवश— शहरी पर्यावरण पर भी बोझ। 7. प्रकृति-संस्कृति संबंध का टूटना: मनुष्य और परिवेश का पारंपरिक संबंध नष्ट।

क्योंकि औद्योगीकरण भौतिक लिप्सा और मुनाफ़े पर आधारित रहा और उसमें विकास-पर्यावरण संतुलन की उपेक्षा हुई। कैसे: सिंगरौली के घने जंगल ठेकेदारों-अधिकारियों ने नष्ट किए, कोयला खदानों ने धरती खोखली की, ताप-विद्युत गृहों से प्रदूषण फैला, उपजाऊ खेत और आम के बाग़ औद्योगिक कॉलोनियों के नीचे दबे, रिहंद बाँध से गाँव डूबे, विस्थापितों से शहरों में स्लम बने, और मनुष्य-प्रकृति-संस्कृति का संबंध टूटा।

Q7

क्या स्वच्छता अभियान की ज़रूरत गाँव से ज़्यादा शहरों में है? (विस्थापित लोगों, मज़दूर बस्तियों, स्लम्स क्षेत्रों, शहरों में बसी झुग्गी बस्तियों के संदर्भ में लिखिए।)

Answer

उत्तर

हाँ, कई दृष्टियों से स्वच्छता अभियान की ज़रूरत शहरों में अधिक है— 1. पाठ का संकेत: लेखक ने विस्थापितों को शहरों की “गंदी, दम घुटती, भयावह बस्तियों और स्लम्स” में देखा, जबकि अमझर गाँव में “स्वच्छ, पवित्र खुलापन”, साफ़-सुथरे खप्पर लगे झोंपड़े देखे। 2. जनसंख्या का दबाव: गाँवों से उजड़े और रोज़गार की तलाश में आए लोग शहरों की झुग्गियों में ठुँसकर रहते हैं; छोटी जगह में बहुत अधिक लोग। 3. बुनियादी सुविधाओं का अभाव: स्लम्स में शौचालय, पीने का साफ़ पानी, नालियाँ, कचरा-निपटान की व्यवस्था नहीं होती; खुले नाले, कूड़े के ढेर। 4. बीमारियाँ: गंदगी से हैजा, डेंगू, मलेरिया, टीबी जैसी बीमारियाँ फैलती हैं। 5. औद्योगिक कचरा और प्रदूषण: मज़दूर बस्तियाँ प्रायः कारखानों के पास होती हैं— धुआँ, रासायनिक कचरा। 6. प्लास्टिक और ठोस कचरा शहरों में कहीं अधिक उत्पन्न होता है।

गाँवों में भी खुले में शौच आदि की समस्या रही है (स्वच्छ भारत मिशन ने इस पर काम किया), पर वहाँ खुलापन और प्राकृतिक परिवेश गंदगी के प्रभाव को कम कर देता है।

उपाय: झुग्गियों का पुनर्वास, सामुदायिक शौचालय, जल-आपूर्ति, कचरा-प्रबंधन, स्वास्थ्य शिविर और जागरूकता।

हाँ — पाठ में ही गाँव का “स्वच्छ, पवित्र खुलापन” और शहरों की “गंदी, दम घुटती” बस्तियाँ आमने-सामने हैं। शहरी स्लम और मज़दूर बस्तियों में विस्थापितों की भीड़, शौचालय-पानी-नाली-कचरा व्यवस्था का अभाव, औद्योगिक प्रदूषण और प्लास्टिक कचरा बीमारियाँ फैलाते हैं। गाँवों में भी समस्याएँ हैं, पर खुला प्राकृतिक परिवेश उन्हें कम करता है। उपाय: पुनर्वास, सामुदायिक शौचालय, जल-आपूर्ति, कचरा-प्रबंधन और जागरूकता।

Q8

निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए। (क) आदमी उजड़ेंगे तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे? (ख) प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है?

Answer

उत्तर

(क) अमरौली प्रोजेक्ट में गाँव उजाड़ने की घोषणा के बाद अमझर के आम के पेड़ सूखने लगे। लेखक कहता है कि मनुष्य और पेड़ों का गहरा, आत्मीय संबंध है; पेड़ मानो मनुष्य के साथी हैं। जब उनकी देखभाल करने वाले, उनके फलों का आनंद लेने वाले मनुष्य ही उजड़ जाएँगे, तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे? पेड़ों का सूखना मानो मनुष्य के विस्थापन के विरोध में उनका मूक सत्याग्रह है। इसमें मनुष्य और प्रकृति की परस्पर निर्भरता और प्रकृति का मानवीकरण है।

(ख) ‘प्रकृति’ यानी प्राकृतिक आपदाएँ (बाढ़, भूकंप) और ‘इतिहास’ यानी मनुष्य द्वारा किया गया विकास और औद्योगीकरण। प्रकृति के कारण विस्थापित लोग आफत टलने पर अपने घर लौट आते हैं, पर इतिहास (विकास और प्रगति) जब लोगों को उन्मूलित करता है, तो वे कभी वापस नहीं लौट सकते, क्योंकि उनका परिवेश ही हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है। यही दोनों के बीच का गहरा अंतर है— प्रकृति की मार अस्थायी है, ‘विकास’ की मार स्थायी।

(क) मनुष्य और पेड़ों का आत्मीय संबंध है; जब देखभाल करने वाले मनुष्य ही उजड़ जाएँगे तो पेड़ जीकर क्या करेंगे — अमझर के आम के पेड़ों का सूखना मानो विस्थापन के विरोध में उनका मूक सत्याग्रह है। (ख) प्राकृतिक आपदा से विस्थापित लोग आफत टलने पर लौट आते हैं, पर इतिहास (विकास-औद्योगीकरण) से उन्मूलित लोग कभी नहीं लौट पाते क्योंकि उनका परिवेश ही नष्ट हो जाता है — प्रकृति की मार अस्थायी, ‘विकास’ की स्थायी।

Q9

निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए— (क) आधुनिक शरणार्थी (ख) औद्योगीकरण की अनिवार्यता (ग) प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच आपसी संबंध

Answer

उत्तर

(क) आधुनिक शरणार्थी: औद्योगीकरण, खदानों, बाँधों और बड़ी परियोजनाओं के कारण अपने गाँव-ज़मीन से हमेशा के लिए उखाड़ दिए गए लोग आधुनिक शरणार्थी हैं। ये अपने ही देश में बेघर हो जाते हैं; शहरों की झुग्गियों में मज़दूरी करते हैं; उनकी संस्कृति, परिवेश और पहचान नष्ट हो जाती है; उनकी अगली पीढ़ी तो यह भी नहीं जानती कि उनके पुरखों का गाँव “जहाँ आम झरा करते थे” कैसा था। पुनर्वास प्रायः अपर्याप्त होता है।

(ख) औद्योगीकरण की अनिवार्यता: आधुनिक युग में रोज़गार, ऊर्जा, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय प्रगति के लिए औद्योगीकरण आवश्यक है; लेखक भी मानता है कि “औद्योगीकरण का चक्का” रोका नहीं जा सकता। पर अनिवार्यता का अर्थ अंधाधुंध, पश्चिम की नकल वाला विकास नहीं है। विकास ऐसा हो जो पर्यावरण, स्थानीय लोगों और संस्कृति के साथ संतुलन रखे— सतत (टिकाऊ) विकास, उचित पुनर्वास, और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप मॉडल।

(ग) प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच आपसी संबंध: भारत में ये तीनों अविभाज्य हैं। मनुष्य प्रकृति (धरती, जंगल, नदी) से भोजन, आवास और जीविका पाता है; इन्हीं से उसके त्योहार, लोकगीत, रीति-रिवाज, मिथक और आस्थाएँ (संस्कृति) जन्म लेते हैं। “अतीत का समूचा मिथक संसार पोथियों में नहीं, इन रिश्तों की अदृश्य लिपि में मौजूद रहता था।” इसलिए प्रकृति के विनाश से मनुष्य उजड़ता है और उसकी संस्कृति भी नष्ट होती है; इन तीनों के बीच नाज़ुक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

(क) विकास परियोजनाओं से हमेशा के लिए उजड़े लोग, जो अपने ही देश में बेघर होकर शहरी झुग्गियों में मज़दूरी करते हैं और अपनी संस्कृति-पहचान खो देते हैं। (ख) रोज़गार, ऊर्जा और प्रगति के लिए औद्योगीकरण अनिवार्य है (“चक्का रोका नहीं जा सकता”), पर वह अंधाधुंध पश्चिमी नकल न होकर पर्यावरण, लोगों और संस्कृति से संतुलित, टिकाऊ और भारतीय स्वरूप का हो। (ग) भारत में प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति अविभाज्य हैं — प्रकृति से जीविका और उसी से त्योहार, मिथक, परंपराएँ (“रिश्तों की अदृश्य लिपि”); प्रकृति-विनाश मनुष्य और संस्कृति दोनों का विनाश है, इसलिए नाज़ुक संतुलन ज़रूरी है।

Q10

निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-सौंदर्य लिखिए— (क) कभी-कभी किसी इलाके की संपदा ही उसका अभिशाप बन जाती है। (ख) अतीत का समूचा मिथक संसार पोथियों में नहीं, इन रिश्तों की अदृश्य लिपि में मौजूद रहता था।

Answer

उत्तर

(क) भाव: सिंगरौली अपनी अपार खनिज संपदा (कोयला), उर्वर भूमि और समृद्ध जंगलों के कारण ‘बैकुंठ’ था। पर यही संपदा उसके लिए अभिशाप बन गई— दिल्ली के सत्ताधारियों और उद्योगपतियों की नज़र उस पर पड़ी; खदानें, ताप-विद्युत गृह, बाँध बने, गाँव उजड़े, जंगल कटे, लोग विस्थापित हुए। यदि वह उजाड़ रेगिस्तान होता तो शायद बचा रहता। सौंदर्य: ‘संपदा’ और ‘अभिशाप’ का विरोधाभास कथन को मार्मिक और विचारोत्तेजक बनाता है; सूक्ति-शैली; आज के “लोलुप युग” पर तीखा व्यंग्य।

(ख) भाव: भारत की सांस्कृतिक विरासत यूरोप की तरह संग्रहालयों या ग्रंथों (पोथियों) में बंद नहीं थी, बल्कि मनुष्य और उसकी धरती, जंगल, नदियों के आत्मीय संबंधों में जीवित थी। लोककथाएँ, मिथक, देवी-देवता, पर्व-त्योहार, पेड़-नदी की पूजा— ये सब मनुष्य और प्रकृति के रिश्तों में रचे-बसे थे। इसलिए विस्थापन से ये रिश्ते टूटते हैं तो पूरी संस्कृति नष्ट हो जाती है। सौंदर्य: ‘रिश्तों की अदृश्य लिपि’— सुंदर रूपक और लाक्षणिक प्रयोग; ‘पोथी’ और ‘अदृश्य लिपि’ का विरोध; गहन चिंतनपरक, तत्सम-प्रधान भाषा।

(क) सिंगरौली की खनिज संपदा, उर्वर भूमि और जंगल ही उसके अभिशाप बने — सत्ताधारियों-उद्योगपतियों की नज़र पड़ी, खदानें-बिजलीघर बने, गाँव उजड़े; ‘संपदा’ और ‘अभिशाप’ का विरोधाभास और सूक्ति-शैली कथन को मार्मिक व व्यंग्यपूर्ण बनाती है। (ख) भारत की संस्कृति ग्रंथों-संग्रहालयों में नहीं, मनुष्य और धरती-जंगल-नदी के आत्मीय संबंधों में जीवित थी; ‘रिश्तों की अदृश्य लिपि’ का सुंदर रूपक और ‘पोथी’ से विरोध इस भाव को गहराई देता है।

अभ्यास – भाषा-शिल्प

Q11

पाठ के संदर्भ में निम्नलिखित अभिव्यक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए— मूक सत्याग्रह, पवित्र खुलापन, स्वच्छ मांसलता, औद्योगीकरण का चक्का, नाज़ुक संतुलन

Answer

उत्तर

अभिव्यक्ति

पाठ के संदर्भ में अर्थ

मूक सत्याग्रह

बिना बोले, शांत विरोध— अमझर के आम के पेड़ों का गाँव उजड़ने की घोषणा के बाद सूख जाना, मानो वे मनुष्य के विस्थापन का मौन विरोध कर रहे हों

पवित्र खुलापन

गाँव का शुद्ध, प्रदूषण-रहित, विस्तृत, खुला प्राकृतिक परिवेश— शहरों की दम घुटती बस्तियों के विपरीत

स्वच्छ मांसलता

धान रोपती औरतों के स्वस्थ, सुडौल, धूप में चमकते शरीर और पूरे दृश्य की सजीव, निर्मल, भरी-पूरी सुंदरता

औद्योगीकरण का चक्का

स्वतंत्रता के बाद शुरू हुई औद्योगिक विकास की वह प्रक्रिया, जो पहिये की तरह लगातार आगे बढ़ती जा रही है और जिसे अब रोका नहीं जा सकता

नाज़ुक संतुलन

प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का कोमल, आसानी से टूट जाने वाला सामंजस्य, जिसे विकास योजनाओं में बचाया जाना चाहिए था

मूक सत्याग्रह — पेड़ों का सूखकर विस्थापन का मौन विरोध; पवित्र खुलापन — गाँव का शुद्ध, खुला, प्रदूषण-रहित परिवेश; स्वच्छ मांसलता — धान रोपती औरतों और दृश्य की स्वस्थ, सजीव, निर्मल सुंदरता; औद्योगीकरण का चक्का — लगातार आगे बढ़ती, न रुकने वाली औद्योगिक विकास-प्रक्रिया; नाज़ुक संतुलन — प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति का कोमल, आसानी से टूटने वाला सामंजस्य।

Q12

इन मुहावरों पर ध्यान दीजिए— मटियामेट होना, आफत टलना, न फटकना

Answer

उत्तर

मुहावरा

अर्थ

पाठ में प्रयोग

अपना वाक्य

मटियामेट होना

पूरी तरह नष्ट हो जाना

आने वाले वर्षों में झोंपड़े, खेत, ढोर, आम के पेड़— सब मटियामेट हो जाएगा

भूकंप में पूरा गाँव मटियामेट हो गया।

आफत टलना

संकट या मुसीबत दूर होना

आफत टलते ही लोग अपने परिवेश में लौट आते हैं

डॉक्टर के आने पर सबको लगा कि आफत टल गई।

न फटकना

पास भी न आना

जहाँ बाहर का आदमी फटकता न था, वहाँ अफ़सरों की कतार लग गई

आलसी विद्यार्थी पुस्तकालय के पास भी नहीं फटकते।

मटियामेट होना — पूरी तरह नष्ट होना (“भूकंप में पूरा गाँव मटियामेट हो गया”); आफत टलना — संकट दूर होना (“डॉक्टर के आने पर लगा कि आफत टल गई”); न फटकना — पास भी न आना (“आलसी विद्यार्थी पुस्तकालय के पास भी नहीं फटकते”)।

Q13

‘किंतु यह भ्रम है …….. डूब जाती हैं।’ इस गद्यांश को भूतकाल की क्रिया के साथ अपने शब्दों में लिखिए।

Answer

उत्तर

किंतु वह भ्रम था… वह बाढ़ नहीं थी, वे पानी में डूबे धान के खेत थे। जब हमने थोड़ी-सी हिम्मत बटोरी और गाँव के भीतर गए, तब हमें वे औरतें दिखाई दीं जो एक पाँत में झुकी हुई छप-छप पानी में धान के पौधे रोप रही थीं। उनकी सुंदर, सुडौल, धूप में चमचमाती काली टाँगें थीं और सिरों पर चटाई के किश्तीनुमा हैट थे, जो फ़ोटो या फ़िल्मों में देखी वियतनामी या चीनी औरतों की याद दिलाते थे। ज़रा-सी आहट पाते ही उन्होंने एक साथ सिर उठाकर चौंकी हुई निगाहों से हमें देखा— बिलकुल उन युवा हिरणियों की तरह, जिन्हें मैंने एक बार कान्हा के वन्यस्थल में देखा था। किंतु वे डरीं नहीं, भागीं नहीं; उन्होंने केवल विस्मय से मुसकुराया और फिर सिर झुकाकर अपने काम में डूब गईं।

“किंतु वह भ्रम था… वह बाढ़ नहीं थी, पानी में डूबे धान के खेत थे। हिम्मत बटोरकर गाँव के भीतर गए तो एक पाँत में झुकी औरतें छप-छप पानी में धान रोपती दिखाई दीं — धूप में चमचमाती सुडौल टाँगें, सिरों पर चटाई के किश्तीनुमा हैट। आहट पाते ही उन्होंने चौंकी हिरणियों-सी निगाहों से हमें देखा, पर वे डरीं नहीं, भागीं नहीं; विस्मय से मुसकुराईं और फिर सिर झुकाकर अपने काम में डूब गईं।”

अभ्यास – योग्यता-विस्तार

Q14

विस्थापन की समस्या से आप कहाँ तक परिचित हैं। किसी विस्थापन संबंधी परियोजना पर रिपोर्ट लिखिए।

Answer

उत्तर

रिपोर्ट: टिहरी बाँध परियोजना और विस्थापन

परिचय: उत्तराखंड में भागीरथी और भिलंगना नदियों के संगम पर बना टिहरी बाँध (ऊँचाई लगभग 260 मीटर) भारत के सबसे ऊँचे बाँधों में से एक है। इसका निर्माण 1978 में शुरू हुआ और 2006 के आसपास बिजली उत्पादन आरंभ हुआ। इससे लगभग 1000 मेगावाट (पहला चरण) बिजली, सिंचाई और दिल्ली-उ.प्र. को पेयजल मिलता है।

विस्थापन: बाँध की झील में पुराना टिहरी शहर (ऐतिहासिक राजधानी) और लगभग 100 से अधिक गाँव पूर्ण या आंशिक रूप से डूब गए। अनुमानतः एक लाख के आसपास लोग विस्थापित हुए। उन्हें नई टिहरी, देहरादून, हरिद्वार आदि में बसाया गया।

समस्याएँ: 1. पहाड़ के लोगों को मैदानी क्षेत्रों में बसाने से उनकी जीवन-शैली, खेती, संस्कृति और सामुदायिक संबंध टूट गए। 2. मुआवज़ा और भूमि अपर्याप्त; अनेक परिवारों को उचित पुनर्वास नहीं मिला। 3. मंदिर, घंटाघर, बाज़ार, पुश्तैनी घर— स्मृतियाँ और विरासत जलमग्न। 4. भूकंपीय क्षेत्र होने से सुरक्षा की आशंका; पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने इसके विरोध में लंबा आंदोलन और अनशन किया।

निष्कर्ष और सुझाव: विकास आवश्यक है, पर परियोजना से पहले प्रभावित लोगों की सहमति, उचित मुआवज़ा, सांस्कृतिक रूप से अनुकूल पुनर्वास, रोज़गार, और पर्यावरणीय प्रभाव का ईमानदार आकलन ज़रूरी है— अन्यथा, निर्मल वर्मा के शब्दों में, ये लोग “जहाँ कोई वापसी नहीं” वाले नए शरणार्थी बन जाते हैं।

(अन्य उदाहरण: सरदार सरोवर/नर्मदा बाँध— ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ (मेधा पाटकर); सिंगरौली की कोयला खदानें।)

रिपोर्ट का नमूना — टिहरी बाँध (भागीरथी-भिलंगना संगम, लगभग 260 मी.): बिजली, सिंचाई और पेयजल का लाभ, पर पुराना टिहरी शहर और 100 से अधिक गाँव डूबे, लगभग एक लाख लोग विस्थापित; समस्याएँ — पहाड़ी जीवन-शैली और संस्कृति का टूटना, अपर्याप्त मुआवज़ा-पुनर्वास, विरासत का डूबना, भूकंप का खतरा (सुंदरलाल बहुगुणा का आंदोलन)। सुझाव: प्रभावितों की सहमति, उचित मुआवज़ा, अनुकूल पुनर्वास, रोज़गार और ईमानदार पर्यावरणीय आकलन।

Q15

लेखक ने दुर्घटनाग्रस्त मज़दूरों को अस्पताल पहुँचाने में मदद की है। आपकी दृष्टि में दुर्घटना-राहत और बचाव कार्य के लिए क्या-क्या करना चाहिए?

Answer

उत्तर

तत्काल (दुर्घटना-स्थल पर): 1. घबराएँ नहीं; पहले अपनी और दूसरों की सुरक्षा सुनिश्चित करें (आग, बिजली, ट्रैफ़िक से बचाव)। 2. तुरंत 112 (आपातकालीन), 108 (एंबुलेंस), 100/101 पर सूचना दें। 3. घायलों को प्राथमिक चिकित्सा— खून बहना रोकना (कपड़े से दबाव), साँस और नब्ज़ देखना, आवश्यकता हो तो CPR; रीढ़ की चोट की आशंका में घायल को अनावश्यक न हिलाना। 4. ‘गोल्डन आवर’ (पहला एक घंटा) में घायल को निकटतम अस्पताल पहुँचाना— जैसे लेखक ने मज़दूरों की मदद की। 5. भीड़ न लगाना, वीडियो बनाने के बजाय मदद करना।

व्यवस्थागत उपाय: 1. कार्यस्थलों (खदान, निर्माण-स्थल, कारखाने) पर सुरक्षा उपकरण— हेलमेट, जूते, बेल्ट; सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन। 2. हर कार्यस्थल पर प्राथमिक चिकित्सा किट और प्रशिक्षित कर्मचारी; पास में एंबुलेंस और अस्पताल की सुविधा। 3. आपदा-प्रबंधन दल (NDRF/SDRF) और नियमित मॉक ड्रिल। 4. स्कूल-कॉलेजों में प्राथमिक चिकित्सा और CPR का प्रशिक्षण। 5. ‘गुड समैरिटन’ कानून की जानकारी— मदद करने वाले को पुलिस या अस्पताल परेशान नहीं कर सकते। 6. दुर्घटनाग्रस्त मज़दूरों के लिए मुफ़्त इलाज, बीमा और मुआवज़ा।

तत्काल: सुरक्षा सुनिश्चित कर 112/108 पर सूचना दें, प्राथमिक चिकित्सा (खून रोकना, साँस-नब्ज़, CPR), ‘गोल्डन आवर’ में अस्पताल पहुँचाएँ, भीड़-वीडियो के बजाय मदद करें। व्यवस्थागत: कार्यस्थलों पर सुरक्षा उपकरण और नियम, प्राथमिक चिकित्सा किट व प्रशिक्षित कर्मी, एंबुलेंस और आपदा-प्रबंधन दल व मॉक ड्रिल, विद्यार्थियों को प्रशिक्षण, ‘गुड समैरिटन’ कानून की जानकारी, मज़दूरों के लिए बीमा, मुफ़्त इलाज और मुआवज़ा।

Q16

अपने क्षेत्र की पर्यावरण संबंधी समस्याओं और उनके समाधान हेतु संभावित उपायों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।

Answer

उत्तर

रिपोर्ट: हमारे शहर/क्षेत्र की पर्यावरणीय समस्याएँ और समाधान

(नमूना— एक मध्यम आकार के उत्तर भारतीय शहर के लिए)

सर्वेक्षण-अवधि और विधि: विद्यालय के पर्यावरण क्लब द्वारा एक सप्ताह तक अवलोकन, निवासियों से बातचीत और नगर निगम के आँकड़ों के आधार पर।

प्रमुख समस्याएँ: 1. वायु प्रदूषण: वाहनों का धुआँ, निर्माण-कार्य की धूल, सर्दियों में पराली और कूड़ा जलाना; AQI अक्सर ‘खराब’ श्रेणी में। 2. जल प्रदूषण और जल-संकट: नदी/तालाब में सीवर और कचरा; भूजल-स्तर का गिरना। 3. ठोस कचरा और प्लास्टिक: खुले में कूड़े के ढेर, नालियों का प्लास्टिक से जाम होना। 4. हरियाली में कमी: सड़कों के चौड़ीकरण और कॉलोनियों के लिए पेड़ों की कटाई। 5. ध्वनि प्रदूषण: हॉर्न, लाउडस्पीकर।

संभावित उपाय: 1. सार्वजनिक परिवहन, साइकिल, कारपूलिंग, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा; निर्माण-स्थलों पर पानी का छिड़काव। 2. वर्षा-जल संचयन, तालाबों का पुनरुद्धार, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट। 3. घर पर गीले-सूखे कचरे का पृथक्करण, कंपोस्टिंग, प्लास्टिक पर रोक, कपड़े के थैले। 4. वृक्षारोपण अभियान— हर विद्यार्थी एक पेड़ गोद ले। 5. जागरूकता रैलियाँ, नुक्कड़ नाटक, ‘स्वच्छ भारत’ और ‘मिशन लाइफ़ (LiFE)’ जैसे अभियानों में भागीदारी। 6. पराली के लिए वैकल्पिक उपयोग (बायो-डीकंपोज़र, बायोगैस)।

निष्कर्ष: पर्यावरण-संरक्षण केवल सरकार की नहीं, हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है। जैसा निर्मल वर्मा कहते हैं, विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन ही स्थायी प्रगति का मार्ग है।

रिपोर्ट का नमूना — समस्याएँ: वायु प्रदूषण (वाहन, धूल, पराली), जल प्रदूषण और गिरता भूजल, कचरा और प्लास्टिक, पेड़ों की कटाई, ध्वनि प्रदूषण। उपाय: सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहन, वर्षा-जल संचयन व तालाब पुनरुद्धार, कचरा पृथक्करण-कंपोस्टिंग और प्लास्टिक पर रोक, वृक्षारोपण, जागरूकता अभियान, पराली के विकल्प। निष्कर्ष: विकास और पर्यावरण का संतुलन ही स्थायी प्रगति है।

विषय-सूची की जाँच

  • ☒ अमझर, नए शरणार्थी, विस्थापन का अंतर, यूरोप-भारत, ट्रैजेडी (प्रश्न 1–5)
  • ☒ औद्योगीकरण-पर्यावरण, स्वच्छता, आशय, टिप्पणी, भाव-सौंदर्य (प्रश्न 6–10)
  • ☒ भाषा-शिल्प (प्रश्न 11–13)
  • ☒ योग्यता-विस्तार (प्रश्न 14–16)

Total questions answered: 16 of 16

Frequently Asked Questions

What do these NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 15 (जहाँ कोई वापसी नहीं) cover?

All 17 questions from the latest NCERT textbook for this chapter are answered step by step, organised as अभ्यास – भाषा-शिल्प and अभ्यास – योग्यता-विस्तार.

Are these solutions based on the new NCERT syllabus?

Yes. The answers follow the current NCERT textbook for Class 12 Hindi Antra and the latest CBSE syllabus, so the question numbers and wording match the book you use in class.

How should I use these solutions to prepare for exams?

Attempt each question on your own first, then compare your working with the answer here. Note the steps or keywords you missed, and revise the chapter notes before taking a chapter-wise MCQ test to check your understanding.

Are the NCERT solutions for Class 12 Hindi Antra Chapter 15 (जहाँ कोई वापसी नहीं) free?

Yes. All Circle of Learning NCERT solutions and chapter notes are free to read online, with no sign-up needed.